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जलवायु परिवर्तन एवं मानव स्वास्थ्य (आलेख)

जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय में एक ज्वलंत मुद्दा है। जलवायु मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सीधे-सीधे प्रभावित करती है। जलवायु का मनुष्य के स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। इसी उद्देश्य से "स्वच्छ हवा सबके लिए" की थीम पर विगत 07 सितंबर को फर्स्ट इंटरनेशनल डे ऑफ क्लीन एयर फॉर ब्लू स्काय मनाया गया।
      वायु प्रदूषण हवा में ठोस कणों, तरल बिन्दु या गैस के रूप में मौजूद पार्टिकुलेट मेटर (पी.एम.) के कारण होता है। ये प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकते है। अति-सूक्ष्म पार्टिकल नासिका या मुंह द्वारा श्वसन के दौरान फेफड़ों तक पहुंचते है । वहां से रक्त की धमनियों में प्रवेश कर शरीर के विभिन्न भागों में ये कण पहुंचते हैं तथा दिल, फेफडे, दिमाग आदि को हानि पहुंचाते हैं।
      वायु प्रदूषण दो प्रकार से मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है। एक उसकी घर की चार दिवारी में जिसमें रसोई घर में कोयला, कण्डें, लकड़ी का ईधन के रूप में उपयोग, केरोसिन लैम्प/स्टोव का उपयोग, मच्छर अगरबत्ती, धूपबत्ती का धुंआ, बीडी, सिगरेट द्वारा धूम्रपान, सिगडी तथा अलाव जलाना, कूड़ा कचरा जलाना, घर में धूलाई/सफाई के लिये रसायनों का प्रयोग, दीवालों पर ताजा पेन्ट जैसी क्रियाएं एवं परिस्थितियां जिम्मेदार हैं । दूसरा प्रदूषण घर से बाहर निकलने पर व्यक्ति को प्रभावित करता है, जिसमें शहरों व उसके आसपास स्थापित उद्योग द्वारा छोड़ा गया धुआं, पावर प्लांट जिससे बिजली बनती है, अनायास जंगलों में लगने वाली आग, निर्माण कार्य हेतु लगने वाले ईट के भट्टे, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में होने वाली आतिशबाजी व उसमे प्रयुक्त पटाखे, डीजल जेनेरेटर से निकलने वाला धुआं, परिवहन और यातायात के लिये चलने वाले वाहन, मिट्टी और सडक की धूल, ठोस कचरे का जलाना, बगीचे के कचरे का जलाना, निर्माण को तोडते समय निकलने वाली धूल, खेतों में कचरा जलाना शामिल है।
       वायु प्रदूषण के गंभीर दुष्परिणामों के रूप में फेफड़े के कैन्सर, निमोनिया, अस्थमा, दिल का दौरा, स्ट्रोक जैसी बीमारियां हो सकती है। फैफडे के कैन्सर से होने वाली मृत्यु में 29 प्रतिशत मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण होता है। स्टोक या दिमागी दौरा पड़ने से होने वाली मृत्यु में 24 प्रतिशत मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण होता है। दिल की बीमारियों से होने वाली मृत्यु में 25 प्रतिशत मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण होता है। फैफड़े की बीमारियों से होने वाली मृत्यु में 43 प्रतिशत मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण होता है। गर्भवती महिला के शिशु का गर्भ में विकास प्रभावित होता है, गर्भस्थ शिशु का समय पूर्व जन्म, कम वजन का होना, आई.क्यू. कम होना, सीखने में कठिनाई होना, बड़ी उम्र में मोटापा या डाईबिटीज जैसी बीमारी का जोखिम होना सम्मिलित है।
       हमें गंभीर दुष्परिणामों से बचना है और आगे आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण प्रदान करना होगा। इसके लिये अभी से प्रयास शुरू कर हमारे व्यवहार का अंग बनाना चाहिये। पर्यावरण सुधार के लिये रसोई घर में स्वच्छ ईधन का उपयोग, खाना बनाते समय खिडकी दरवाजे खुले रखना, वाहनों का पी.यू.सी. चेक करना, पेड़-पौधे लगाना, हरियाली बढ़ाना, कूड़ा-कचरा ना जलाना, धूम्रपान ना करना आदि उपाय करना होंगे।


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